विश्व शांति बाहुबल से नहीं आत्मबल से संभव,आत्म-परिवर्तन और वैश्विक शांति का संदेश,ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान नीलबड़ स्थित सुख-शांति भवन में ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा की पुण्य स्मृति पर विश्व शांति दिवस का आयोजन।

ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय के संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा की 57वीं पुण्य स्मृति के अवसर पर भोपाल के नीलबड़ स्थित सुख-शांति भवन में विश्व शांति दिवस श्रद्धा, शांति और आध्यात्मिक वातावरण में मनाया गया। यह आयोजन केवल एक स्मृति कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्म-जागृति, आत्म-परिवर्तन और विश्व शांति के गहन संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बना। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि विश्व में स्थायी शांति हथियारों या बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि आत्मबल और आत्म-चेतना से ही संभव है। संपूर्ण विश्व में शांति की स्थापना का कार्य केवल एक परमात्मा ही कर सकते हैं, जो ज्ञान, प्रकाश और चेतना के रूप में मानवता का मार्गदर्शन करते हैं। कार्यक्रम में बताया गया कि 18 जनवरी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मानव चेतना के जागरण और आत्मा-परमात्मा के मिलन से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय इस दिन को वर्षों से विश्व शांति दिवस के रूप में मनाता आ रहा है। यह दिवस मानव को स्मरण कराता है कि जब संसार में अशांति, तनाव, हिंसा और नैतिक पतन बढ़ता है, तब परमात्मा दिव्य ज्ञान के माध्यम से मानव जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं।

आत्म-परिवर्तन से ही होगा विश्व परिवर्तन: सुख-शांति भवन की निदेशिका आदरणीय राजयोगिनी नीता दीदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि विश्व की हर समस्या का समाधान बाहरी सुधारों में नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन में निहित है। जब मनुष्य स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा से जोड़ता है, तब उसके विचार, शब्द और कर्म स्वतः ही शांति, पवित्रता और कल्याण से भर जाते हैं। उन्होंने कहा कि आज भौतिक प्रगति के बावजूद आध्यात्मिक शून्यता के कारण तनाव, अवसाद और अशांति बढ़ रही है। ऐसे समय में राजयोग ध्यान मनुष्य को भीतर से सशक्त बनाकर जीवन में संतुलन, स्थिरता और सकारात्मकता प्रदान करता है।

ब्रह्मा बाबा का जीवन – साधारण से असाधारण की प्रेरणा,वरिष्ठ राजयोगी भ्राता रामकुमार भाईजी ने ब्रह्मा बाबा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 15 दिसंबर 1876 को हुआ। वर्ष 1936 के बाद उनके जीवन में गहन आध्यात्मिक परिवर्तन आया और 1937 में ब्रह्माकुमारीज़ संस्था की स्थापना हुई। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन पवित्रता, त्याग और मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। 18 जनवरी 1969 को उन्होंने पार्थिव देह का त्याग किया, किंतु उनके विचार आज भी विश्वभर में शांति, सद्भाव और आत्म-जागृति का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। वर्तमान में ब्रह्माकुमारीज़ संस्था 140 से अधिक देशों में राजयोग ध्यान, मूल्य शिक्षा, नारी सशक्तिकरण और विश्व शांति के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही है।

राजयोग ध्यान से हुआ शांति का अनुभव: कार्यक्रम की शुरुआत राजयोग ध्यान से हुई, जिसमें उपस्थितजनों ने आत्म-चेतना और परमात्म-स्मृति का गहन अनुभव किया। सभी उपस्थित लोगों ने विश्व शांति, सामाजिक सौहार्द, नारी सम्मान और सकारात्मक जीवन मूल्यों को अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में विशेष रूप से संघमित्रा जी, माहेश्वरी जी (उद्योगपति), इंस्पेक्टर संजीव जी, बच्चानी जी (व्यवसायी) सहित शहर के अनेक गणमान्य नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, महिलाएँ एवं युवा उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन शांतिमय वातावरण में ईश्वरीय प्रसाद वितरण के साथ हुआ। 

"आयोजन का संदेश"  “विश्व शांति कोई दूर का स्वप्न नहीं, बल्कि आत्म-जागृति से संभव एक जीवंत वास्तविकता है।”

न्यूज़ सोर्स : mp1news Bhopal