मुरैना की गजक को मिलेगा बजट बूस्ट? व्यापारी बोले—एक्सपोर्ट से छाएंगे ग्लोबल मार्केट में
मुरैना: चंबल के मुरैना की मशहूर गजक आज स्वाद से आगे बढ़कर व्यापार और अर्थव्यवस्था का विषय बन चुकी है. गुड़ और तिल के समिश्रण व चंबल के पानी से तैयार होने वाली इस गजक ने जीआई टैग मिलने के बाद नई पहचान हासिल की है. बढ़ते कारोबार और देश-दुनिया में बढ़ती मांग के बीच अब मुरैना के गजक व्यापारियों की निगाहें आगामी केंद्रीय बजट पर टिकी है. व्यापारियों को उम्मीद है कि यदि बजट में लघु उद्योगों, पारंपरिक मिठाई कारोबार और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए करों में राहत, सब्सिडी और सुविधाएं दी जाती हैं, तो गजक उद्योग को नई उड़ान मिलेगी.
गजक की विरासत सालों पुरानी
चंबल के मुरैना की मशहूर शाही गजक सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि 100 साल पुरानी विरासत और मेहनतकश हाथों की पहचान है. यह बात गजक कारोबारी ताराचंद शिवहरे ने बताई. सर्दियों की दस्तक के साथ ही यहां की भट्टियों में तिल और गुड़ की खुशबू घुलने लगती है, जो अब स्वाद से आगे बढ़कर उम्मीदों के बजट से भी जुड़ गई है. जीआई टैग मिलने के बाद मुरैना की गजक को राष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है, लेकिन अब यहां के कारोबारियों की निगाहें आगामी केंद्रीय बजट पर टिकी है.
आर्युर्वेदिक परंपरा से जुड़ीं गजक की जड़ें
मुरैना में बनने वाली गजक की जड़ें आयुर्वेदिक परंपरा से जुड़ी बताई जाती हैं. सर्द मौसम में शरीर को गर्म रखने के लिए तिल और गुड़ का मिश्रण तैयार किया गया, जो समय के साथ विकसित होकर आज की कुरकुरी, परतदार शाही गजक बन गया. चंबल का पानी, शुद्ध देसी घी, चुना हुआ तिल और हाथों से की जाने वाली पारंपरिक कूटाई इसके स्वाद को अलग पहचान देती है.
4 महीनों में हजारों करोड़ का होता है कारोबार
आज जिले में करीब 200 छोटे-बड़े कारोबारी इस काम से जुड़े हैं. नवंबर के आखिर से शुरू होकर मार्च तक चलने वाला यह सीजन 4 महीनों में हजारों करोड़ों का कारोबार देता है. खास बात यह है कि मुरैना से गजक सिर्फ देश के अलग-अलग राज्यों में ही नहीं, बल्कि विदेशों तक पार्सल से भेजी जाती है. कारोबारियों का मानना है कि यदि बजट में पारंपरिक खाद्य उद्योग, लघु व्यापार और निर्यात को बढ़ावा देने वाली राहतें मिलती हैं, तो यह कारोबार नई उड़ान भर सकता है.
व्यापारियों को टैक्स में छूट की आस
टैक्स में छूट, कच्चे माल की लागत में राहत और बेहतर पैकेजिंग व लॉजिस्टिक समर्थन मिलने पर चंबल की यह मिठास अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़े ब्रांड की तरह स्थापित हो सकती है. स्थानीय व्यापारियों को उम्मीद है कि सही नीतिगत सहारा मिला तो गजक उद्योग न सिर्फ हजारों लोगों को रोजगार देगा, बल्कि भारतीय पारंपरिक स्वाद को वैश्विक पहचान दिलाते हुए देश की अर्थव्यवस्था में भी मीठा इजाफा करेगा.
सर्दियों में औषधि का काम करता है गजक
स्वाद के साथ-साथ इम्युनिटी पावर बढ़ाने के लिए भी यह गजक खास है. गजक बनाने में इस्तेमाल होने वाली तिल और गुड़ सर्दियों में शरीर के लिए औषधि का काम करती है. गजक उनके स्वास्थ्य के लिए भी बहुत ही लाभदायक है. गजक गर्म तासीर की होती है, इस वजह से यह सर्दियों के लिए एक टॉनिक का काम करती है और सबसे खास बात यह है कि मिठाई सबसे शुद्ध और सुरक्षित आती है, क्योंकि इसे बनाने में शुद्ध गुड़, चीनी और तिल का उपयोग किया जाता है.
गजक की कई वैरायटी
चंबल में 20 से 25 वैरायटी की गजक बनाई जाती है. वैसे तो मुरैना में बनने वाली गुड़ और शक्कर की गजक काफी प्रसिद्ध है, लेकिन अब अंचल में कई वैरायटी की गजक बनाई जा रही है. जिसमें गजक के लड्डू, पटरी रोल, समोसा गजक जैसी कई वैरायटी प्रमुख है. यहां से गजक पूरे देश भर के अलग-अलग राज्यों में जाती है. मुरैना के लगभग 100 से अधिक कारीगर अलग-अलग राज्यों में गजक बनाने का काम करते हैं.
बजट से आस लगाए व्यापारी
कारोबारियों का कहना है कि यदि बजट में पारंपरिक उद्योगों, लघु व्यापार और निर्यात को लेकर सरकार ने राहत दी, तो चंबल की यह मिठास देश से निकलकर विदेशों में भी धूम मचाएगी. मुरैना की गजक कोई नई खोज नहीं, बल्कि इसका इतिहास प्राचीन है. बताया जाता है कि आयुर्वेदाचार्यों ने सर्दी से बचाव और शरीर में गर्माहट बनाए रखने के लिए गुड़ और तिल के मिश्रण से यह रेसिपी तैयार की थी. समय के साथ यही गजक पट्टी से विकसित होकर आज विश्वप्रसिद्ध मुरैना की गजक बन गई.
गजक का बिजनेस अर्थव्यवस्था को देता है मजबूती
चंबल के पानी, शुद्ध सामग्री और पारंपरिक विधि ने इसके स्वाद को खास पहचान दी है. आज चंबल अंचल के मुरैना में करीब 200 छोटे-बड़े कारोबारी गजक के व्यवसाय से जुड़े हैं. यह कारोबार हर साल नवंबर के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर मार्च तक चलता है और चार महीनों में करोड़ों रुपए का टर्नओवर होता है. व्यापारियों का कहना है कि यदि सरकार ने बजट में सहयोग किया, तो चंबल की गजक अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय स्वाद की पहचान बनेगी और इससे स्थानीय रोजगार के साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी. इससे देश की आर्थिक इकोनॉमी में भी इजाफा होगा.

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