भोपाल 04मई/तपस्या, त्याग और महाविजय बंगाल विजय में कैलाश विजयवर्गीय का अदम्य राष्ट्र-समर्पण
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के “फर्श से अर्श” तक के ऐतिहासिक सफर की गाथा केवल चुनावी आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह तपस्या, त्याग और अटूट संकल्प का जीवंत उदाहरण है। इस परिवर्तनकारी यात्रा में यदि कोई नाम तेजस्वी सूर्य की भांति उभरता है, तो वह है कैलाश विजयवर्गीय—एक ऐसे कर्मयोगी, जिन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए असंभव को संभव करने का साहस दिखाया।
13 मई 1956 को इंदौर की पावन माटी में जन्मे कैलाश विजयवर्गीय का जीवन प्रारंभ से ही संस्कारों, राष्ट्रसेवा और संगठन के प्रति समर्पण से ओतप्रोत रहा। विज्ञान स्नातक और विधि (LLB) की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने 1975 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। 1983 में पार्षद बनने से लेकर वर्ष 2000 में इंदौर के प्रथम प्रत्यक्ष निर्वाचित महापौर बनने तक का उनका सफर निरंतर जनसेवा और संगठनात्मक क्षमता का परिचायक रहा। छह बार विधायक और 12 वर्षों तक कैबिनेट मंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासनिक दक्षता का भी परिचय दिया। इस पूरे संघर्षमय सफर में उनकी पत्नी आशा जी और पुत्र आकाश विजयवर्गीय का सहयोग सदैव उनके साथ रहा।
वर्ष 2015 में जब उन्हें “मिशन बंगाल” का दायित्व सौंपा गया, तब पश्चिम बंगाल में भाजपा की स्थिति अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी। कार्यकर्ताओं पर हमले, राजनीतिक हिंसा और सीमित जनाधार के बीच उन्होंने हार मानने के बजाय संघर्ष को चुना। 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 3 सीटें और 10.2% वोट मिले, लेकिन विजयवर्गीय ने इसे पराजय नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत माना। उन्होंने इंदौर की सुविधाओं को छोड़कर बंगाल की धरती को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। भाषा, संस्कृति और स्थानीय समस्याओं को समझते हुए उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर खड़ा किया। बूथ स्तर से लेकर सोशल मीडिया तक संगठन को सशक्त बनाने का कार्य किया। महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और घुसपैठ जैसे मुद्दों को जनआंदोलन का रूप दिया, जिससे जनता का विश्वास भाजपा के प्रति मजबूत हुआ।
इस अथक परिश्रम का परिणाम 2019 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला,जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतकर ऐतिहासिक सफलता हासिल की। इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 77 सीटों तक पहुंचकर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। हालांकि सत्ता नहीं मिल सकी, लेकिन विजयवर्गीय ने एक सच्चे सेनापति की तरह हार की जिम्मेदारी स्वयं ली और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखा।
4 मई 2026 को पश्चिम बंगाल में भाजपा की 206 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत की ओर बढ़ती विजय ने वर्षों की तपस्या को स्वर्णिम परिणाम में बदल दिया। “पहले चरण में 100+ सीटें” का उनका आत्मविश्वासपूर्ण आकलन भी पूरी तरह सत्य साबित हुआ। यह जीत केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के सामूहिक परिश्रम की विजय है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विराट दृष्टिकोण और गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति को धरातल पर साकार करने में कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने यह सिद्ध किया कि जब हृदय में राष्ट्रप्रेम और नेतृत्व के प्रति अटूट विश्वास हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। आज पूरा राष्ट्र गर्व और भावुकता के साथ इस ऐतिहासिक उपलब्धि को नमन कर रहा है। कैलाश विजयवर्गीय केवल एक नाम नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत हैं—ऐसी प्रेरणा, जो आने वाली पीढ़ियों को संघर्ष, समर्पण और राष्ट्रसेवा के मार्ग पर अग्रसर होने का संदेश देती है।

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