मुरली mp1news के माध्यम से पढ़ सकते हैं,YouTube को क्लिक कर सुन भी सकते है।

सेवा करते डबल लाइट स्थिति द्वारा फरिश्तेपन की अवस्था में रहो, अशरीरी बनने का अभ्यास करो

आज बापदादा चारों ओर के बच्चों के तीन रूप देख रहे हैं - जैसे बाप के तीन रूप जानते हो, ऐसे बच्चों के भी तीन रूप देख रहे हैं। जो इस संगमयुग का लक्ष्य और लक्षण है, पहला स्वरूप ब्राह्मण, दूसरा फरिश्ता, तीसरा देवता। ब्राह्मण सो फरिश्ता, फरिश्ता सो देवता। तो वर्तमान समय अभी विशेष क्या लक्ष्य सामने रहता है? क्योंकि फरिश्ता बनने के बिना देवता नहीं बन सकते। तो वर्तमान समय और स्वयं के पुरुषार्थ प्रमाण अभी लक्ष्य यही है फरिश्ता। संगमयुग का सम्पन्न स्वरूप फरिश्ता सो देवता बनना है। फरिश्ते की परिभाषा जानते भी हो, फरिश्ता अर्थात् पुरानी दुनिया के सम्बन्ध, संस्कार, संकल्प से हल्का हो। पुराने संस्कार सबमें हल्के हों। सिर्फ अपने संस्कार स्वभाव, संसार में हल्कापन नहीं, लेकिन फरिश्ता अर्थात् सर्व के सम्बन्ध में आते सर्व के स्वभाव संस्कार में हल्कापन। इस हल्केपन की निशानी क्या है? वह फरिश्ता आत्मा सर्व के प्यारे होंगे। कोई कोई के प्यारे नहीं, सर्व के प्यारे। जैसे ब्रह्मा बाप को हर एक समझता है मेरा है। मेरा बाबा कहते हैं। ऐसे फरिश्ता अर्थात् सर्व के प्रिय। कई बच्चे सोचते हैं कि ब्रह्मा बाबा तो ब्रह्मा ही था, लेकिन आप सबने आप समान ब्राह्मण आत्माओं में देखा कि आप सबकी प्यारी दादी, जिसको सभी प्यार से अनुभव करते रहे कि मेरी दादी है। सर्व तरफ स्वभाव, संस्कार और इस पुराने संसार में रहते न्यारी और प्यारी, सब हक से कहते हमारी दादी। तो कारण क्या? स्वयं स्वभाव, संस्कार में हल्के। सबको मेरापन अनुभव कराया। तो एक्जैम्पुल रहा। जगत अम्बा का भी देखा लेकिन कई सोचते हैं वह तो जगत अम्बा थी ना। लेकिन दादी आप ब्राह्मण परिवार जैसी साथी थी। उनसे अगर पुरुषार्थ सुनते वा पूछते तो उनके मुख में सदैव एक ही शब्द रहा - “अब कर्मातीत बनना है।'' कर्मातीत बनने की लगन में औरों को भी यही शब्द बार-बार याद दिलाती रही। तो हर ब्राह्मण का अभी लक्ष्य और लक्षण विशेष यही रहना चाहिए, है भी लेकिन नम्बरवार है। यही लगन हो अब फरिश्ता बनना ही है। फरिश्ता अर्थात् इस देह, साकार देह से न्यारा, सदा लाइट के देहधारी। फरिश्ता अर्थात् इस कर्मेन्द्रियों के राजा।

बापदादा ने पहले भी सुनाया कि सारे सृष्टि चक्र के अन्दर एक ही बापदादा है जो फलक से कहते हैं कि मेरा एक एक बच्चा राजा बच्चा है, स्वराज्य अधिकारी है। तो फरिश्ता अर्थात् स्वराज्य अधिकारी। ऐसा स्वराज्य अधिकारी आत्मा, लाइट के स्वरूपधारी। कोई भी ऐसे लाइट के डबल हल्केपन की स्थिति में स्थित होंके अगर कोई को भी मिलते हैं तो उनके मस्तक में आत्मा ज्योति का भान चलते फिरते भी दिखाई देगा। अभी यह तीव्र पुरुषार्थ का लक्ष्य और लक्षण सदा इमर्ज रखो। जैसे ब्रह्मा बाप में देखा अगर कोई भी मिलता, दृष्टि लेता तो बात करते-करते क्या दिखाई देता? और लास्ट में अनुभव किया कि ब्रह्मा बाप बात करते-करते भी मीठी अशरीरी स्थिति में स्थित हो जाता। चाहे कितना भी सर्विस समाचार हो, लेकिन दूसरों को भी सेकण्ड में अशरीरीपन का अनुभव कराते रहे और कोई भी मुरली में चेक करो, तो बार-बार मैं अशरीरी आत्मा हूँ, आत्मा का पाठ एक ही मुरली में कितनी बार याद दिलाते रहे। तो अभी समय अनुसार छोटी-छोटी विस्तार की बातें, स्वभाव-संस्कार की बातें अशरीरी अवस्था से दूर कर देती हैं। अभी इसमें परिवर्तन चाहिए।

बापदादा ने देखा सेवा में रिजल्ट अच्छी हो रही है, सेवा के लिए मैजारिटी को उमंग-उत्साह है, प्लैन भी बनाते रहते हैं, सन्देश देना यह भी आवश्यक है और बापदादा ने आज भी भिन्न-भिन्न वर्ग की, भिन्न-भिन्न स्थान के सेवा की अच्छी रिजल्ट देखी लेकिन सेवा के साथ अशरीरीपन का वायुमण्डल मेहनत कम और प्रभाव ज्यादा डालता है। सुना हुआ अच्छा तो लगता है, लेकिन वायुमण्डल से अशरीरीपन की दृष्टि से अनुभव करते हैं और अनुभव भूलता नहीं है। तो फरिश्तेपन की धुन अभी सेवा में विशेष एडीशन करो। कोई न कोई शान्ति का, खुशी का, सुख का, आत्मिक प्रेम का अनुभव कराओ। चलन में प्यार प्रेम और जो खातिरी करते हो, सम्बन्ध से, परिवार से वह तो अनुभव करके जाते हैं लेकिन अतीन्द्रिय सुख की फीलिंग, शान्ति का रूहानी नशा अभी वायुमण्डल और वायब्रेशन द्वारा विशेष अटेन्शन में रखो। विशेष अनुभव कराओ, कोई न कोई अनुभव कराओ। जैसे सिस्टम में प्रभावित होके जाते हैं ऐसी सिस्टम परिवार के प्यार की और कहाँ भी नहीं मिलती, ऐसे अभी कोई न कोई शक्ति का, कोई न कोई प्राप्ति का अनुभव करके जायें। अभी 70-72 वर्ष पूरे हो रहे हैं, इतने समय की रिजल्ट में क्या देखा! मेहनत की है, लेकिन अभी तक ब्रह्माकुमारियां काम कर रही हैं, ब्रह्माकुमारियों का ज्ञान अच्छा है। देने वाला कौन! चलाने वाला कौन! सोर्स कौन! आप सबसे बाबा शब्द सुन करके कहते भी हैं बाबा है इन्हों का, लेकिन मेरा वही बाबा है, बाप की प्रत्यक्षता अभी गुप्त रूप में है। बाबा बाबा कहते हैं, लेकिन मेरा बाबा, मैं बाबा का, बाबा मेरा, यह कोटों में कोई के मुख से निकलता है।

तो संगमयुग का लक्ष्य क्या है? हम सब आत्माओं का बाप आ गया, वर्सा तो बाप द्वारा मिलेगा ना! वह प्रभाव फरिश्ता अवस्था से वायुमण्डल फैलेगा। इन्हों की दृष्टि से लाइट मिलती है, इन्हों की दृष्टि में रूहानियत की लाइट नज़र आती है, तो अभी तीव्र पुरुषार्थ का यही लक्ष्य रखो मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ, चलते फिरते फरिश्ता स्वरूप की अनुभूति को बढ़ाओ। अशरीरीपन के अनुभव को बढ़ाओ। सेकण्ड में कोई भी संकल्पों को समाप्त करने में, संस्कार स्वभाव में डबल लाइट। कई बच्चे कहते हैं हम तो हल्के रहते हैं लेकिन हमको दूसरे जानते नहीं हैं। लेकिन ऐसे डबल लाइट फरिश्ता, तो डबल लाइट की लाइट क्या छिप सकती है? छोटी सी स्थूल लाइट टार्च हो या माचिस की तीली हो लाइट कहाँ भी जलेगी, छिपेगी नहीं और यह तो रूहानी लाइट है, तो अपने वायुमण्डल से उन्हों को अनुभव कराओ कि यह कौन हैं! चाहे जगदम्बा चाहे दादी ने कहा नहीं कि मुझे जानते नहीं हैं। अपने वायुमण्डल से सर्व की प्यारी रही, इसीलिए दादी का मिसाल देते हैं क्योंकि ब्रह्मा बाप के लिए भी सोचते हैं ब्रह्मा बाबा में तो शिवबाबा था, शिव बाप के लिए भी सोचते कि वह तो है ही निराकार, न्यारा और निराकार, हम तो स्थूल शरीरधारी हैं। इतने बड़े संगठन में रहने वाले हैं, हर एक के संस्कार के बीच में रहने वाले हैं, संस्कार को मिलाना अर्थात् फरिश्ता बनना। संस्कार को देख कई बच्चे दिलशिकस्त भी हो जाते हैं, बाबा बहुत अच्छा, ब्रह्मा बाप बहुत अच्छा, ज्ञान बहुत अच्छा, प्राप्तियां बहुत अच्छी, लेकिन संस्कार स्वभाव मिलाना अर्थात् सर्व के प्यारे बनना। कोई कोई के प्यारे नहीं, क्योंकि कई बच्चे कहते हैं कि कोई कोई से प्यार विशेषता को देख करके भी हो जाता है। इनका भाषण बहुत अच्छा है, इसमें फलानी विशेषता बहुत अच्छी है, वाणी बहुत अच्छी है, फरिश्ता बनने में यह विघ्न आता है। प्यारा भले बनाओ, लेकिन मैं आत्मा न्यारी हूँ, न्यारी स्टेज से प्यारा बनाओ। विशेषता से प्यारा नहीं। यह इसका गुण मुझे बहुत अच्छा लगता है ना, वह धारण भले करो लेकिन इसके कारण सिर्फ प्यारा बनना वह रांग है। फरिश्ता सभी का प्यारा। हर एक कहे मेरा, अपनापन अनुभव हो। ऐसी फरिश्ते अवस्था में विघ्न दो चीज़ें डालती हैं। एक तो देह भान, वह तो नेचुरल सबको अनुभव है, 63 जन्म का फिर फिर देहभान प्रगट हो जाता है और दूसरा है देह अभिमान, देह भान और देह अभिमान, ज्ञान में जितना आगे जाते हैं, तो स्वयं के प्रति भी कभी कभी देह-अभिमान आ जाता है, वह अभिमान नीचे गिराता है, देह अभिमान क्या आता है? जो भी कोई विशेषता है ना, उस विशेषता के कारण अभिमान रहता है, मैं कोई कम हूँ, मेरा भाषण सबको पसन्द आता है। मेरी सेवा का प्रभाव पड़ता है, कोई भी कला, मेरी हैण्डलिंग बहुत अच्छी है, मेरा कोर्स कराना बहुत अच्छा है। कोई न कोई ज्ञान में आगे बढ़ने में, सेवा में आगे बढ़ने में यह अभिमान अपने प्रति भी आता और दूसरे के गुण या कला या विशेषता प्रति भी प्यार हो जाता। लेकिन याद कौन आयेगा? देहभान ही याद आयेगा ना, फलाना बुद्धि का बहुत अच्छा है, मेरी हैण्डलिंग बहुत अच्छी है, यह अभिमान सेवा वा पुरुषार्थ में आगे बढ़ने वालों को अभिमान के रूप में आता है। तो यह भी चेक करना है और अभिमान वाले को अभिमान है तो इसको चेक करने का साधन है, अभिमान वाले को जरा भी कोई ने अपमान किया, उसके विचार का, उसकी राय का, उसकी कला का, उसकी हैण्डलिंग का अपमान बहुत जल्दी महसूस होगा। और अपमान महसूस हुआ, उसकी और सूक्ष्म निशानी क्रोध का अंश पैदा होता है, रोब। वह फरिश्ता बनने नहीं देता। तो वर्तमान समय के हिसाब से बापदादा फिर से इशारा दे रहा है, अपना संगमयुग का लास्ट स्वरूप फरिश्ता अब जीवन में प्रत्यक्ष करो, साकार में लाओ। फरिश्ता बनने से अशरीरी बनना बहुत सहज हो जायेगा। अपनी चेकिंग करो, कि अपनी विशेषता या और किसकी विशेषता से सूक्ष्म रूप में भी कोई लगाव वा अभिमान तो नहीं है? कई बच्चों की अवस्था कोई छोटी सी बात भी होगी ना तो नीचे ऊपर हो जाती है। दिलखुश, चेहरा खुश... उसके बजाए या चिंतन वाला चेहरा या चिंता वाला चेहरा हो जाता और चलते-चलते दिलशिकस्त भी हो जाते। दिलखुश के बजाए दिलशिकस्त। तो समझा, अब अपने संगमयुग की लास्ट स्टेज फरिश्तेपन के संस्कार इमर्ज करो। जैसे ब्रह्मा बाप को देखा, फालो फादर करना है ना। बात करते-करते लास्ट में कई बच्चों को अनुभव है, सुनाने आये समाचार लेकिन समाचार से परे, आवाज से परे स्थिति का अनुभव किया हुआ देखा है। कई बातों का समाचार सुनाने, बहुत प्लैन बनाकर आते यह बताऊंगा, यह बताऊंगा, यह पूछूंगा... लेकिन सामने आते क्या बोलना था वही भूल जाता। तो यह है फरिश्ता अवस्था। तो आज क्या पाठ पक्का किया? मैं कौन? फरिश्ता। किसी बातों से, किसी की विशेषताओं से वा अपनी विशेषता से, देह अभिमान से परे डबल लाइट फरिश्ता क्योंकि फरिश्ता बनने के बिना देवता का ऊंचा पद नहीं मिलेगा। सतयुग में तो आ जायेंगे, क्योंकि बच्चे बने हैं, वर्सा तो मिलेगा लेकिन श्रेष्ठ पद नहीं। जो वायदा है सदा साथ रहेंगे, साथ-साथ राज्य करेंगे, तख्त पर भले नहीं बैठे लेकिन राज्य अधिकारी बनें, वहाँ की राज्य सभा देखी है ना। जो भी राज्य सभा के अधिकारी हैं, वह तिलक और ताजधारी, राज्य का तिलक, राज्य की निशानी ताज। तो बहुत समय से स्वराज्य अधिकारी, बीच-बीच में नहीं। बहुत समय के स्वराज्य अधिकारी तख्त पर भले नहीं बैठे लेकिन रॉयल फैमिली के अधिकारी बन जाते हैं। अच्छा।

अच्छा, आज जो पहली बारी आये हैं वह उठो। अच्छा, पौनी सभा तो उठी हुई है। अच्छा जो भी पहली बारी आये हैं, उन सभी को बाप से साकार में मिलने की, पहले बारी की जन्म की मुबारक हो। बापदादा का सभी आये हुए बच्चों को यही वरदान है कि आये टूलेट के समय हैं लेकिन नये आये हुए बच्चों प्रति एक विशेष वरदान है कि कभी भी यह संकल्प नहीं करना कि हम आगे कैसे जा सकते? टूलेट आने वालों को, अभी तो लेट में आये हो, टूलेट में नहीं आये हो और अभी आप सबको विशेष बापदादा और निमित्त बने हुए ब्राह्मण परिवार के भाई बहिनों की विशेष सहयोग की भावना है कि अगर आप थोड़े समय को, एक एक सेकण्ड को सफल करने का, क्योंकि थोड़े समय में बहुत पाना है, एक सेकण्ड भी व्यर्थ नहीं गंवाना, कर्मयोगी बनके चलना, कर्म नहीं छोड़ना है लेकिन कर्म में योग एड करते, कर्म और योग का बैलेन्स रखना है। तो बैलेन्स रखने वाले को ब्लैसिंग एकस्ट्रा मिलती है। तो जो भी लेट में आये हो, टूलेट अभी आगे लगना है, आपको चांस है, थोड़े समय में बहुत पुरुषार्थ कर सकते हो। बापदादा वरदान देते हैं कि हिम्मते बच्चे मददे बाप है ही।

सभी चारों ओर के बच्चों को बापदादा के दिल की दुआयें, पदमगुणा बधाईयां और मुबारक दे रहे हैं और आने वाले अथवा जो पत्र ईमेल भेजते हैं उन्हों का सेकण्ड से भी कम समय में बापदादा के पास पहुंच जाता है। उन्हों को भी और बापदादा की प्यासी आत्मायें, बांधेलियां जो मार को भी गले का हार बना देती हैं, ऐसी आत्माओं को भी यादप्यार और नये-नये स्नेही आत्मायें जो अभी निकल रही हैं, लेकिन कम। स्नेही और सहयोगी डबल होना चाहिए। तो चारों ओर के सभी युवा, वृद्ध, बच्चे, मातायें, पाण्डव, सभी को मुबारक हो। अच्छा।

वरदान:-    साकार और निराकार बाप के साथ द्वारा हर संकल्प में विजयी बनने वाले सदा सफलमूर्त भव
जैसे निराकार आत्मा और साकार शरीर दोनों के सम्बन्ध से हर कार्य कर सकते हो, ऐसे ही निराकार और साकार बाप दोनों को साथ वा सामने रखते हुए हर कर्म वा संकल्प करो तो सफलमूर्त बन जायेंगे क्योंकि जब बापदादा सम्मुख हैं तो जरूर उनसे वेरीफाय करा करके निश्चय और निर्भयता से करेंगे। इससे समय और संकल्प की बचत होगी। कुछ भी व्यर्थ नहीं जायेगा, हर कर्म स्वत: सफल होगा।
स्लोगन:-रूहानी स्नेह सम्पत्ति से भी अधिक मूल्यवान है इसलिए मास्टर स्नेह के सागर बनो।

कार्यालय:-राजयोगभवन,E-5 अरेरा कॉलोनी भोपल मप्र,

संपर्क:-ईश्वरीय सेवा और सहयोग में बी.के.इंजीनियर नरेशबाथम:-9691454063,9406564449

न्यूज़ सोर्स : madhuban/mp1news Bhopal