सरकार vs विपक्ष किसकी दलील मजबूत? मुद्दा सरकार का पक्ष, विपक्ष का आरोप भूमि अधिग्रहण नियमों के तहत अनियमितता SIA रिपोर्ट समय पर तैयार पारदर्शिता नहीं, मुआवजा पूरा भुगतान विसंगतियां, खनन कार्य अधिग्रहण के पहले शुरू,सिंगरौली के धिरौली कोल ब्लॉक पर विधानसभा में घमासानधि, 2672 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण, 368 करोड़ मुआवजा और एसआईए रिपोर्ट पर सरकार का विस्तृत जवाब।

मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान प्रश्नकाल में सिंगरौली जिले के धिरौली कोयला ब्लॉक को लेकर जोरदार राजनीतिक टकराव देखने को मिला। विपक्ष के नेता उमंग सिंघार द्वारा उठाए गए अनियमितताओं के सवालों ने सदन का माहौल गरमा दिया। जवाब में राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने विस्तृत तथ्य रखते हुए सरकार की स्थिति स्पष्ट की, वहीं प्रभारी मंत्री संपतिया उइके ने भी सरकार की कार्यवाही को पूरी तरह नियम सम्मत बताया।

सिंगरौली जिला,जो देश के प्रमुख ऊर्जा उत्पादन क्षेत्रों में शामिल है, वहां स्थित धिरौली कोल ब्लॉक में भूमि अधिग्रहण और मुआवजे को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। विधानसभा में यह मामला तब गरमाया जब विपक्ष ने आरोप लगाया कि: आदिवासी और स्थानीय ग्रामीणों की भूमि का अधिग्रहण बिना पारदर्शिता के किया गया। सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIA) रिपोर्ट की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है मुआवजे के वितरण में भारी अनियमितता हुई है। कुछ स्थानों पर अधिग्रहण से पहले ही खनन कार्य शुरू कर दिया गया। उमंग सिंघार के तीखे सवाल विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने सरकार से सीधे सवाल करते हुए कहा कि कुल कितनी भूमि का अधिग्रहण किया गया और कितनी भूमि निजी व शासकीय है? क्या अधिग्रहण प्रक्रिया पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 के तहत पूरी की गई? सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट कब तैयार हुई? क्या अधिग्रहण से पहले ही खनन शुरू कर दिया गया? क्या यह मामला संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आता है या नहीं? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने नियमों को दरकिनार कर आदिवासी क्षेत्रों में जल्दबाजी में कार्यवाही की है।

राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा का जवाब “सब कुछ नियमों के तहत” राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए सदन में तथ्यात्मक जानकारी दी: भूमि अधिग्रहण का पूरा विवरण धिरौली कोल ब्लॉक के लिए कुल 2672 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित की गई,इसमें शामिल है निजी भूमि: 554.01 हेक्टेयर,शासकीय गैर वन भूमि: 681.80 हेक्टेयर,
संरक्षित वन भूमि: 1335.35 हेक्टेयर, राजस्व वन भूमि: 62.19 हेक्टेयर,कुल मिलाकर 8 गांव इस परियोजना से प्रभावित हुए हैं। प्रक्रिया और अधिसूचना भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया 2013 के अधिनियम के तहत की गई। अधिसूचना 15 फरवरी 2022 को जारी की गई। सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट 4 फरवरी 2022 को तैयार हुई।

मंत्री ने स्पष्ट किया कि सभी प्रक्रियाएं तय नियमों और समयसीमा के अनुसार पूरी की गईं। मुआवजा और भुगतान
5 गांवों की 203.882 हेक्टेयर निजी भूमि का अधिग्रहण पूर्ण कुल 368.11 करोड़ रुपये का मुआवजा स्वीकृत,संशोधित मुआवजा राशि: 504.37 करोड़ रुपये,अब तक भुगतान की गई राशि:504,37,26,331 रुपये। मंत्री ने कहा कि मुआवजा पूरी पारदर्शिता के साथ दिया गया है। शासकीय भूमि पर स्थिति 151.05 हेक्टेयर शासकीय भूमि का आवंटन यह प्रक्रिया मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 247 के तहत की गई।खनन कार्य पर स्पष्टीकरण जिन 3 गांवों में भूमि अधिग्रहण नहीं हुआ, वहां खनन कार्य शुरू नहीं किया गया।केवल सर्वे और प्रारंभिक कार्यवाही हुई है। इस बयान से सरकार ने विपक्ष के उस आरोप को खारिज किया कि अधिग्रहण से पहले खनन शुरू कर दिया गया।

प्रभारी मंत्री संपतिया उइके का वक्तव्य प्रभारी मंत्री संपतिया उइके ने भी सदन में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि राज्य सरकार आदिवासी और ग्रामीण हितों के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है।किसी भी परियोजना में पुनर्वास, पुनर्स्थापन और उचित मुआवजा सर्वोच्च प्राथमिकता है,धिरौली परियोजना में भी सभी प्रक्रियाएं कानूनी प्रावधानों के अनुरूप की गई हैं। उन्होंने कहा “सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि विकास और स्थानीय हितों के बीच संतुलन बना रहे। किसी के अधिकारों का हनन नहीं होने दिया जाएगा।”

विपक्ष का वॉकआउट और विरोध,सरकार के जवाब से असंतुष्ट विपक्ष ने सदन में नारेबाजी की जवाब को अधूरा और भ्रामक बताया अंततः वॉकआउट किया।विपक्ष का कहना था कि जमीन अधिग्रहण और मुआवजे में अभी भी कई विसंगतियां हैं।संयुक्त समिति से जांच कराई जानी चाहिए। प्रमुख विवाद के बिंदु इस पूरे मामले में निम्न बिंदु सबसे ज्यादा चर्चा में रहे पारदर्शिता का सवाल क्या सभी प्रक्रियाएं वास्तव में पारदर्शी थीं? आदिवासी अधिकार क्या पांचवीं अनुसूची के प्रावधान लागू होते हैं? मुआवजा वितरण क्या सभी प्रभावितों को समान रूप से लाभ मिला? खनन की शुरुआत क्या अधिग्रहण से पहले कार्य शुरू हुआ?

राजनीति के केंद्र में विकास बनाम अधिकार धिरौली कोल ब्लॉक का मुद्दा केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि विकास और स्थानीय अधिकारों के बीच संतुलन का प्रतीक बन गया है। सरकार जहां इसे विकास और निवेश से जोड़ रही है,वहीं विपक्ष इसे आदिवासी अधिकारों और पारदर्शिता का मुद्दा बना रहा है। विधानसभा में हुई इस बहस ने स्पष्ट कर दिया कि आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का केंद्र बन सकता है। धिरौली कोल ब्लॉक को लेकर उठे सवालों ने यह साबित कर दिया है कि बड़े प्रोजेक्ट्स में केवल आर्थिक विकास ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। सरकार ने अपने जवाब में आंकड़ों और प्रक्रियाओं के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है, लेकिन विपक्ष के सवाल अभी पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या इस मामले में आगे कोई जांच या नई कार्रवाई होती है, या यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक ही सीमित रह जाता है।

न्यूज़ सोर्स : mp1news Bhopal