छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की पाटन तहसील अंतर्गत ग्राम बाटांग में किसान दुर्गेश जोशी ने आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाते हुए मछली पालन का एक अनोखा और प्रेरणादायक मॉडल विकसित किया है। सीमित संसाधनों में अधिक उत्पादन देने वाली बायोफ्लॉक तकनीक के माध्यम से उन्होंने न केवल अपनी आय में वृद्धि की है, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों और युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए द्वार भी खोल दिए हैं। इस नवाचार को समझने और इसके व्यावहारिक पहलुओं को जानने के लिए छत्तीसगढ़ कृषि महाविद्यालय, धनोरा (दुर्ग) की बीएससी कृषि चतुर्थ वर्ष की छात्रा ऐश्वर्या नेल्लोल ने कृषि पत्रकारिता एवं व्यवहार कौशल मॉड्यूल के अंतर्गत ग्राम बाटांग का दौरा किया। उन्होंने किसान दुर्गेश जोशी से सीधे संवाद कर मछली पालन की तकनीक, प्रबंधन, लागत और लाभ से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की।

किसान दुर्गेश जोशी ने बताया कि उन्होंने लगभग 1000 वर्गमीटर क्षेत्रफल के तालाब में 4 से 5 फीट जलस्तर बनाए रखते हुए बायोफ्लॉक तकनीक को अपनाया है। इस प्रणाली में मुख्य रूप से कैटफिश और तिलापिया जैसी तेज़ी से बढ़ने वाली मछलियों का पालन किया जा रहा है, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है और उचित मूल्य भी मिलता है।उन्होंने विस्तार से बताया कि बायोफ्लॉक तकनीक का मूल आधार पानी के भीतर सूक्ष्मजीवों का संतुलन बनाए रखना है। इस तकनीक में पानी में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया मछलियों के अपशिष्ट को प्रोटीन युक्त फ्लॉक में परिवर्तित कर देते हैं, जिसे मछलियां पुनः भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं। इससे मछलियों को अतिरिक्त पोषण मिलता है और बाहरी फीड पर खर्च भी कम हो जाता है।इस तकनीक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें पानी की खपत अत्यंत कम होती है। पारंपरिक मछली पालन की तुलना में बायोफ्लॉक प्रणाली में बार-बार पानी बदलने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे जल संरक्षण भी होता है। साथ ही, पानी की गुणवत्ता लगातार बनी रहती है, जिससे मछलियों का विकास तेज़ी से होता है और रोगों की संभावना भी कम रहती है।

दुर्गेश जोशी के इस मॉडल से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कम जगह में अधिक मछलियों का पालन कर बेहतर मुनाफा प्राप्त किया जा रहा है। यह मॉडल उन किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो रहा है, जिनके पास सीमित भूमि और जल संसाधन हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बायोफ्लॉक तकनीक भविष्य में मत्स्य पालन के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। खासकर जल संकट वाले क्षेत्रों में यह तकनीक किसानों के लिए आय का स्थायी और सशक्त माध्यम बन सकती है। इसके माध्यम से कम लागत में अधिक उत्पादन संभव है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। ग्राम बाटांग में विकसित यह मॉडल कृषि और मत्स्य पालन के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। किसान दुर्गेश जोशी का यह प्रयास न केवल आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह अन्य किसानों और युवाओं को भी आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।

बायोफ्लॉक तकनीक आधारित यह मछली पालन मॉडल ग्रामीण भारत में रोजगार सृजन, आय वृद्धि और संसाधनों के बेहतर उपयोग का एक सफल उदाहरण बनकर उभरा है। यदि इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो यह देश के मत्स्य पालन क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।

न्यूज़ सोर्स : mp1news Bhopal