ओवैसी को लेकर गिरिराज का विवादित बयान, राजनीतिक हलकों में हलचल
नई दिल्ली: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने धार जिले के बहुचर्चित और विवादित भोजशाला परिसर को लेकर एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। अदालत ने एएसआई (ASI) के वैज्ञानिक सर्वेक्षण, ऐतिहासिक साहित्यों और पुख्ता पुरातात्विक साक्ष्यों को सही मानते हुए इस पूरे परिसर को विद्या की देवी मां सरस्वती (वाग्देवी) का मूल मंदिर घोषित कर दिया है। उच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि परमार वंश के प्रतापी राजा भोज की इस पावन विरासत में हिंदुओं की पूजा-अर्चना का क्रम कभी नहीं टूटा था, और यह प्राचीन काल में एक संस्कृत अध्ययन केंद्र व भव्य मंदिर ही था। इस अदालती फैसले के आते ही देश का राजनीतिक तापमान बढ़ गया है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता और सांसद गिरिराज सिंह ने इस फैसले का स्वागत करते हुए एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पर तीखा राजनीतिक हमला बोला और कहा कि देर-सवेर ओवैसी को भी अपने हिंदू पूर्वजों की सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा।
ओवैसी की आपत्ति और शीर्ष अदालत से उम्मीद
इस फैसले के तत्काल बाद एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी कड़ी असहमति दर्ज कराई है। उन्होंने भरोसा जताया कि देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) इस आदेश को निरस्त कर देगी। ओवैसी ने दलील दी कि यह परिसर पिछले सात सौ वर्षों से एक क्रियाशील मस्जिद रहा है, जिसे वर्ष 1935 के धार स्टेट गजट और वक्फ के आधिकारिक दस्तावेजों में भी मस्जिद के रूप में मान्यता मिली हुई है। उन्होंने 'प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991' (पूजा स्थल अधिनियम) की दुहाई देते हुए कहा कि 15 अगस्त 1947 के समय जो भी धार्मिक ढांचा जिस स्वरूप में था, उसकी स्थिति को कानूनी रूप से बदला नहीं जा सकता।
हिंदू पक्ष की कानूनी घेराबंदी और कैविएट दाखिल
हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की संभावनाओं को देखते हुए हिंदू पक्ष ने भी अपनी कानूनी तैयारी पुख्ता कर ली है। हिंदू पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक 'कैविएट याचिका' दायर की गई है। इस कैविएट का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि मुस्लिम पक्ष इस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख करता है, तो अदालत हिंदू पक्ष की दलीलों और पक्ष को सुने बिना कोई भी एकतरफा स्थगनादेश (स्टे) या अंतरिम आदेश जारी न करे।
नमाज की अनुमति वाला पुराना आदेश रद्द और अन्य याचिकाएं खारिज
अपने विस्तृत फैसले में हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा 7 अप्रैल 2003 को जारी किए गए उस पुराने आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार को इस परिसर के भीतर नमाज अदा करने की विशेष अनुमति दी गई थी। अदालत ने अब यहां केवल हिंदू समुदाय को नियमित पूजा-अर्चना और उपासना का संपूर्ण अधिकार देने वाली याचिका को स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही, मामले से जुड़ी मुस्लिम और जैन पक्षों की अन्य चार याचिकाओं को कोर्ट ने मैरिट के आधार पर खारिज कर दिया।
मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन और लंदन से प्रतिमा वापसी की राह
अदालत ने विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने की दिशा में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि मुस्लिम समुदाय धार जिले में नई मस्जिद के निर्माण के लिए जमीन के आवंटन हेतु आवेदन करता है, तो राज्य सरकार को कानूनी नियमों के तहत उस पर सकारात्मक विचार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, वर्तमान में लंदन के प्रसिद्ध ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित रखी मां वाग्देवी (सरस्वती) की ऐतिहासिक प्रतिमा को वापस भारत लाकर भोजशाला में स्थापित करने की मांग पर भी कोर्ट ने संज्ञान लिया। अदालत ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार इस संबंध में प्राप्त होने वाले आवेदनों और कूटनीतिक प्रयासों पर गंभीरता से विचार कर सकती है।

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